समानता का अधिकार | right to equality in hindi

समानता का अधिकार

हमारा संविधान कहता है कि सरकार भारत में किसी व्यक्ति को कानून के सामने समानता या कानून से आरक्षण के मामले में समानता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। इसका मतलब यह हुआ कि किसी व्यक्ति का दर्जा या पद चाहे जो हो सब पर कानून समान रूप से लागू होता है।

इससे कानून का राज भी कहते हैं कानून का राज किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है इसका अर्थ हुआ कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है किसी राजनेता सरकारी अधिकारी या सामान्य नागरिक में कोई अंतर नहीं किया जा सकता प्रधानमंत्री हो या दूर-दराज के गांव का कोई खेतिहर मजदूर सब पर एक ही कानून लागू होता है।

कोई भी व्यक्ति वैधानिक रूप से अपने पद या जन्म के आधार पर विशेषाधिकार या खास व्यवहार का दावा नहीं कर सकता जैसे कुछ साल पहले देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री पर भी धोखाधड़ी का मुकदमा चला था। सारे मामले पर गौर करने के बाद अदालत ने उनको दोषी घोषित किया लेकिन जब तक मामला चला उन्होंने किसी अन्य आम नागरिक की तरह ही अदालत में जाना पड़ा।

अपने पक्ष में सबूत देने पड़े कागजात दाखिल करने पर इस बुनियादी स्थिति को संविधान में समानता के अधिकार के कुछ निहितार्थ को स्पष्ट करने और साफ किया है सरकार किसी से भी उसके जाति धर्म समुदाय लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करती।

दुकान होटल और सिनेमाघरों जैसे सार्वजनिक स्थल में किसी के प्रवेश को रोका नहीं जा सकता इसी प्रकार सार्वजनिक कुएं तालाब स्नान घाट सड़क खेल के मैदान और सार्वजनिक भवनों के इस्तेमाल से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता।

यह चीजें ऊपर से बहुत सरल लगती है पर जाति व्यवस्था वाले हमारे समाज में कुछ समुदायों के लोगों को सार्वजनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करने से रोका जाता है। सरकारी नौकरियों पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। सरकार में किसी पद पर नियुक्त या रोजगार के मामले में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता है।

उपरोक्त अधिकारों पर किसी भी नागरिक को रोजगार के आयोग नहीं करार दिया जा सकता या उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता भारत सरकार ने नौकरियों में अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की है। अनेक सरकारें विभिन्न योजनाओं के तहत कुछ नौकरियों में स्त्री गरीब या शारीरिक रूप से विकलांग लोगों को प्राथमिकता देती है।

आप सोच सकते हैं कि आरक्षण की इस तरह की व्यवस्था समानता के अधिकार के खिलाफ है पर असल में ऐसा नहीं है समानता का मतलब है हर किसी से उसकी जरूरत का ख्याल रखते हुए समान व्यवहार करना समानता का मतलब है। हर आदमी को उसकी क्षमता के अनुसार काम करने का समान अधिकार उपलब्ध कराना कई बार अवसर की समानता सुनिश्चित करने भर के लिए ही कुछ लोगों को विशेष अवसर देना जरूरी होता है।

आरक्षण यही करता है इसी बात को साफ करने के लिए संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि इस तरह का आरक्षण समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है किसी तरह का भेदभाव ना होने का सिद्धांत सामाजिक जीवन पर भी इसी तरह लागू होता है। संविधान सामाजिक भेदभाव के एक बहुत ही प्रबल प्रारूप छुआछूत का जिक्र करता है और सरकार को निर्देशित करता है कि वह इसे समाप्त करें किसी भी तरह के छुआछूत को कानूनी रूप से गलत करार दिया गया है।

यहां छुआछूत का मतलब कुछ खास जातियों के लोगों के शरीर को छूने से बचना भर नहीं है यह उन सारी सामाजिक मान्यताओं और हां चरणों को भी गलत करार देता है जिसमें किसी खास जाति में जन्म लेने भर से लोगों को नीची नजर से देखा जाता है या उनके साथ अलग तरह का व्यवहार किया जाता है इसलिए संविधान ने छुआछूत को दंडनीय अपराध घोषित किया है।

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